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सपा- बसपा में सीटों के बंटवारे के बाद क्षेत्रों पर माथापच्ची !

प्रखर लखनऊ। प्रदेश के सियासत के  दो बड़े खिलाड़ी  समाजवादी पार्टी  और बहुजन समाज पार्टी ने गेस्ट हाउस कांड के 24 साल बाद एक बार फिर गठजोड़ कर चुनाव में उतरने का एलान किया है। जिसके साथ ही उत्तर प्रदेश की राजनीति 360 डिग्री पर घूमते हुए 26 साल पुरानी स्थिति में पहुंच चुकी है। जहाँ सपा और बसपा ने मिलकर चुनाव लड़ा और उत्तर प्रदेश की सियासत को अपने लपेटे में ले लिया था। लेकिन 2 साल बाद ही दोनों के रास्ते अलग हो गए। वजह बना गेस्ट हाउस कांड जिसमें समाजवादी पार्टी के नेताओं ने बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती के साथ बदतमीजी करते हुए उनके कपड़े तक फाड़ डाले थे। हालांकि इन 24 सालों में इन्हीं दोनों ने उत्तर प्रदेश की शासन व्यवस्था को संभाला एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करते हुए दोनों पार्टियों ने सत्ता का आनंद लिया । पिछले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने दोनों को हाशिए पर छोड़ दिया था । मोदी की नीतियों और राजनीति से लोहा लेने के लिए एक बार फिर समय ने दोनों पार्टियों को एक साथ खड़ा होने के लिए मजबूर कर दिया है। दोनों पार्टियों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर लोकसभा की सीटें तो आपस में बांट ली है लेकिन अभी दोनों में रार इस बात को लेकर है कि कौन सी सीट से कौन पार्टी चुनाव लड़ेगी। अमेठी और रायबरेली कांग्रेस के लिए छोड़ने के बाद करीब तेरह सीटों पर दोनों दलों के बीच रस्साकसी जारी है। दोनों पार्टियां 2014 के लोकसभा चुनावों में प्रदर्शन को आधार मानते हुए सीट बंटवारे पर रणनीति बना रही है। बसपा ने भले ही 2014 में एक भी सीट नहीं जीती हो मगर 44 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जिन पर बसपा सपा से आगे रही थी। इनमें से दो (अमेठी और रायबरेली) पर सपा ने उम्मीदवार खड़े नहीं किए थे।
सपा भी 36 सीटों पर बसपा से आगे रही थी। सपा की इन सीटों में वो पांच सीटें भी शामिल हैं जिस पर उसे जीत मिली थी। यानी 2014 के प्रदर्शन के आधार पर सपा-बसपा के बीच क्रमश: 36 और 42 सीटों (कांग्रेस के लिए दो छोड़कर) का आधार बनता है बावजूद इसके दोनों दलों में 38-38 सीटों पर सहमति बनी है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले चुनावों में छह सीटों पर सपा-बसपा कांग्रेस से भी पीछे रही थीं। इनमें सहारनपुर, गाजियाबाद, लखनऊ, कानपुर, बाराबंकी और कुशीनगर शामिल है। हालांकि, यहां जीत भाजपा उम्मीदवारों की हुई थी। इन सभी सीटों पर कांग्रेस नंबर दो और बसपा तीसरे नंबर पर रही थी। यानी इन सीटों पर भाजपा के खिलाफ त्रिकोणात्मक संघर्ष था। इनके अलावा लोकसभा की आठ सीटें ऐसी थीं जहां बसपा और सपा को मिले वोट का अंतर 10 हजार से भी कम था। इन सीटों में सलेमपुर, हरदोई, सुल्तानपुर, भदोही, अलीगढ़, धौरहरा, बाराबंकी और उन्नाव शामिल है। सपा बसपा ने अपने गठबंधन में तीन सीटें रालोद को दी है और रायबरेली और अमेठी से नहीं लड़ने का फैसला लिया है। अब देखना यह है कि प्रदेश में यह आखरी गठबंधन साबित होता है या फिर इससे इतर कांग्रेस भी किसी अन्य गठबंधन के साथ मैदान में आती है ।

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