ग़ाज़ीपुर- हीमोफीलिया दिवस पर विशेष- मसूढ़े से लगातार खून बहे तो हो जाएं सावधान- डॉ. के.के. सिंह

• हीमोफीलिया रक्तस्राव संबंधी एक अनुवांशिक बीमारी है

• प्रदेश में 26 केन्द्रों पर होता है हीमोफीलिया का इलाज

प्रखर ब्यूरो ग़ाज़ीपुर। यदि आपके बच्चे के दूध के दांत टूटने एवं नये दांत निकलते समय मसूढ़े से लगातार खून बह रहा हो। तो सावधान हो जाएं यह हीमोफीलिया के लक्षणों में से एक है। यह कहना है एनसीडी के नोडल डॉ. के.के. सिंह का।

डॉ. के.के. सिंह ने बताया कि हीमोफीलिया दिवस हर वर्ष 17 अप्रैल को मनाया जाता है। इस अवसर पर उन्होने बीमारी के बारे में विस्तार से जानकारी दी। डॉ. के.के. सिंह ने बताया कि हीमोफीलिया रक्तस्राव संबंधी एक अनुवांशिक बीमारी है। इससे ग्रसित व्यक्ति में लम्बे समय तक रक्त स्राव होता रहता है। यह खून में थक्का जमाने वाले आवश्यक फैक्टर के न होने या कम होने के कारण होता है। रक्तस्राव चोट लगने या अपने आप भी हो सकता है। मुख्यतः रक्तस्राव जोड़ो, मांसपेशियों और शरीर के अन्य आंतरिक अंगों में होता है और अपने आप बन्द नहीं होता है। यह एक असाध्य जीवन पर्यन्त चलने वाली बीमारी है लेकिन इसको कुछ खास सावधानियां बरतने से और हीमोफीलिया प्रतिरोधक फैक्टर के प्रयोग से नियंत्रित किया जा सकता है। भारत में 80,000 से 100,000 लोग हीमोफीलिया से ग्रसित हैं इसमें से अबतक केवल 18,500 की पहचान हो पायी है। इस विषय पर एसीएमओ डॉ. प्रगति कुमार ने लक्षण के बारे में बताया जो इस प्रकार हैं कि यदि प्रसव के समय नाभि की नाल, माँस से अलग करने पर लम्बे समय तक लगातार रक्तस्राव होता है। यदि बच्चे के शरीर पर किसी भी जगह नीले या काले दाग पड़ जाते हैं और महीने या उससे अधिक समय तक रहते हैं। यदि बच्चे के दूध के दांत टूटने एवं नये दांत निकलने की प्रक्रिया में मसूड़े से लगातार रक्तस्राव होता है। यदि बच्चे के किसी भी जोड़ में सूजन आ जाती है और वह रक्त अथवा फ्रेश फ्रोज़न प्लाज्मा देने से ठीक हो जाती है। तो यह सभी लक्षण बच्चे के हीमोफीलिया से ग्रसित होने की प्रबल सम्भावना को दर्शाते हैं।
हीमोफीलिया के रोगी के जोड़ो में सूजन के साथ अक्सर दर्द का होना, असल में उसके जोड़ में आन्तरिक रक्तस्राव होना है। यदि यह सूज नया आन्तरिक रक्तस्राव जोड़ो में बार-बार होता है तो वह जोड़ों को विकृत बना देता है और उस जोड़ को बेकार कर देता है। इस तरह रोगी में विकलांगता की शुरुआत हो जाती है। इसके अतिरिक्त यदि यह रक्तस्राव रोगी की आंतों में अथवा दिमाग के किसी हिस्से में शुरू हो जाये तो यह जान लेवा भी हो सकता है। इसका इलाज तुरन्त अथवा जल्द से जल्द होना अति आवश्यक है। इस बाबत एसीएमओ डॉ. के.के. वर्मा ने हीमोफीलिया के प्रकार के बारे में बताया कि यदि हीमोफीलिया रोगी के रक्त में थक्का जमाने वाले फैक्टर VIII की कमी हो तो इसे हीमोफीलिया ए कहते है। यदि रक्त में थक्का जमाने वाले फैक्टर IX की कमी हो तो इसे हीमोफीलिया बी कहते है। इस प्रकार मरीज को जिस फैक्टर की कमी होती है वह इंजेक्शन के जरिये उसकी नस में दिया जाता है। इससे रक्तस्राव रूक सके यही हीमोफीलिया की एक मात्र औषधि है। रक्त जमाने वाले फैक्टर अत्यधिक महंगे होने के कारण अधिकांश मरीज इलाज से वंचित रह जाते हैं। हीमोफीलिया से ग्रस्त व्यक्तियों को सही समय पर इंजेक्शन लेना, नित्य आवश्यक व्यायाम करना, रक्त संचारित रोग (एचआईवी, हीपाटाइटिस बी व सी आदि) से बचाव, दांतों की सुरक्षा के बारे में शिक्षित करना ही हीमोफीलिया से बचाव का उपाए है। हीमोफीलिया सोसाइटी के सचिव विनय मनचंदा ने कहा कि हीमोफीलिया के इलाज कि सुविधा प्रदेश के 26 स्वास्थ्य केन्द्रों पर उपलब्ध है। लेकिन धन अभाव में हीमोफीलिया प्रतिरोधक फैक्टर की सप्लाई नहीं हो पा रही है। यूपी में गत वर्ष 42.3 करोड़ दिये गए थे। इस वर्ष के लिए 50 करोड़ की मांग की गई है लेकिन बजट रिलीज नहीं हुआ है। उन्होने यूपी सरकार से हीमोफीलिया के मरीजों के लिए प्राथमिकता से कार्य करने की अपील की है। गौरतलब है कि हीमोफीलिया दिवस हर वर्ष 17 अप्रैल को मनाया जाता है।