जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा में कुशीनगर के लाल चंद्रभान हुये शहीद 

शहीद चंद्रभान की पार्थिव शरीर सम्भवतः बुधवार को आने की उम्मीद
प्रखर कुशीनगर। देश के लिए मर मिटने के लिए जवान सेना में भर्ती होते हैं और देश की बॉर्डर की रक्षा करते हुए अपनी जान गवा देते हैं। आए दिन पाकिस्तान की कायराना हरकत की वजह से कोई न कोई जवान घायल या शहीद हो ही जाता है। लेकिन यह शहादत बेकार नहीं जाती लोगों के जेहन में सदियों तक बनी रहती है। इस बार उत्तर प्रदेश के जनपद कुशीनगर के एक लाल ने सीमा पर शहादत दी है ।।बता दें कि जम्मू कश्मीर के कुपवाड़ा में कुशीनगर के तमकुहीराज तहसील निवासी  चंद्रभान जम्मू कश्मीर के कुपवाड़ा में शहीद हो गए। जिसके बाद परिवार व घर में शोक की लहर दौड़ पड़ी। पूरा गांव शोक में डूब चुका है। पार्थिव शरीफ जब घर पहुंचा परिजनों सहित पूरा इलाका रो पड़ा। जानकारी के अनुसार तमकुहीराज तहसील अंतर्गत रामबाग के डुमरी गांव के निवासी चंद्रभान तैनाती के दौरान जम्मू कश्मीर में बर्फबारी कारण शहीद हो गए जिसकी जानकारी होने पर घर में कोहराम मच गया तथा गांव में शोक की लहर दौड़ गई। बतादे कि उक्त तहसील अन्तर्गत विकासखण्ड दुदही के न्यायपंचायत बंगरा रामबक्स के दुमही के होनहार छात्र रहें चंन्द्रभान हमेशा देश प्रेम कि बात सोचता था। जो देश सेवा के जज्बे लिऐ 25 वर्ष की उम्र में आर्मी की नौकरी ज्वाइन की थी। चंन्द्रभान की पहली पोस्टिंग पंजाब प्रांत के जालन्धर में हुआ वह दो वर्ष नौकरी करने के बाद उनका तबादला जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा सेक्टर में हो गई। चन्द्रभान अपने माता पिता के सबसे छोटे पुत्र थे। जो सोमवार को जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा में अत्यधिक बर्फ बारी होने कारण वह शहीद हो गये। जिसकी सूचना मंगलवार सुबह परिजनों को मिला। चंन्द्रभान की शहादत की सूचना मिलते ही क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। तथा लोग शहीद के दरवाजे पर पहुंच कर उस क्रूर काल को कोसने लगे। चंन्द्रभान को नौकरी ज्वाइन करने के कुछ दिन बाद 7 जुलाई 2016 को उसकी शादी बिहार राज्य के गोपालगंज जिले की रहने वाली पिंकी से हुई। जिससे तीन वर्ष व एक वर्ष के दो बच्चे हैं। बतादें कि शहीद चंन्द्रभान अभी दो माह पहले छठ पर्व पर घर आया था। पत्नी ने बताई कि बच्चो का ख्याल रखने को कहते हुए फोन पर बातये कि वह अगले माह यानी फरवरी में घर आऐंगे। बहुत पहले ही शहीद की मां का देहांत हो चूका हैं तथा पिता राजबल्लभ चौरसिया घर पर रह कर खेती बारी का काम करते हैं। बड़े भाई जिवकोपार्जन हेतु बाहर प्राइवेट नौकरी करते है। जिससे शहीद चंन्द्रभान की जिम्मेदारी ज्यादा थी और पुरे परिवार का देख भाल वही करता था। अन्तिम विदाई में जिले के आला अफसरो व  सरकार के मंत्रीयों के साथ क्षेत्र के तमाम सामाजिक व गणमान्य लोगो की उपस्थिती में किया जायेगा। चंद्रभान के शहीद होने के बाद मानो परिजनोंं पर दुखों का कोई बड़ा पहाड़ टूट पड़ा हो, लेकिन विधि के विधान को कौन टाल सकता है। जिसे जाना है वह जाकर ही रहेगा। बताया जाता है कि चंद्रभान पूरे घर परिवार का रीढ़ था, क्योंकि चंद्रभान की माता का पहले ही देहांत हो चुका था। पिता खेती-बाड़ी करते है । लेकिन विधि के विधान के आगे किसकी चली है और ऐसा समय आया कि चंद्रभान मात्र 25 वर्ष की उम्र में देश की रक्षा करते हुए शहीद हो गए।