पूर्व कुलपति समेत तीन प्रोफेसरों पर एफआईआर की संस्तुति

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– सत्र 2007-2009 में गलत तरीके से पीएचडी कराने का मामला

– स्थापना का शताब्दी वर्ष बना रहा विद्यापीठ

प्रखर वाराणसी। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ अपने स्थापना का शताब्दी वर्ष मना रहा है। एक तरफ संस्थाएं अपने विकास के साथ नए मील का पत्थर स्थापित करती हैं। तो वहीं महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में इन दिनों दागियों का बोलबाला है। बता दें कि 2007-2009 में पीएचडी कराने के मामले में आई जांच रिपोर्ट में विश्व विद्यालय में कार्यरत तत्कालीन विभागाध्यक्ष समेत तीन प्रोफेसरों प्रो परमानंद सिंह, प्रो राघवेंद्र पांथरी, प्रो लक्ष्मी शंकर उपाध्याय, प्रो योगेंद्र सिंह एवं तत्कालीन कुलसचिव डॉ रमाशंकर राम सहित कई लिपिक और कर्मचारियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 465,467 एवं 218 के अंतर्गत एफआईआर पंजीकृत कराने की संस्तुति की है। जांच समिति के सदस्य इंद्र बहादुर सिंह अवकाश प्राप्त न्यायाधीश एवं प्रोफेसर लोकनाथ सिंह ने इस पूरे प्रकरण पर कड़ी टिप्पणी करते हुए इसे गिरोह अपराध बताया है। अपनी जांच रिपोर्ट में इन सदस्यों ने लिखा है कि इन सभी लोगों पर एफआईआर दर्ज कराते हुए कड़ी कार्यवाही की जाय ताकि इस आपराधिक क्रिया कलाप में लिप्त गिरोह का उन्मूलन हो सके एवं विश्वविद्यालय का कार्य सुचारू रूप से चलाया जा सके। बता दें कि 2007-2008 और 2008-2009 में इतिहास विभाग में शोध में दाखिला लिया गया था। उसी समय यह मामला सामने आया था कि प्रवेश में अनियमितता हुई है । विश्वविद्यालय ने उस समय इसे रफा-दफा कर दिया था लेकिन पत्रकार और आरटीआई कार्यकर्ता सुधांशु सिंह ने इस मामले में शिकायत करते हुए राजभवन को पत्र लिखा था। उसके बाद 2011 में राजभवन के निर्देश पर प्रोफेसर सत्या सिंह की अध्यक्षता में जांच समिति गठित की गई थी और इस पूरे मामले पर अनियमितता उजागर हुई थी । जिसके बाद 16 छात्रों के रिसर्च पर रोक लगा दी गई थी। बता दें कि इस सत्र में शोध समिति ने सिर्फ 77 पीएचडी छात्रों का ही अनुमोदन किया था लेकिन 2007 से 2009 तक इतिहास विभाग में शोध के लिए कुल 150 दाखिले हुए थे यानी करीब 73 छात्रों का प्रवेश अवैध था । जबकि इसके पूर्व में गठित जांच समिति ने इसकी संख्या सिर्फ 51 बताई थी । अपने स्थापना का शताब्दी वर्ष बना रहा महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ इन दिनों दागियों और भ्रष्टाचारियों के चंगुल में फंसा दिखाई दे रहा है।बता दें कि इस जांच रिपोर्ट में जिन प्रोफेसरों और कर्मचारियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराने की संस्तुति की गई है। उसमें से एक प्रोफ़ेसर की मौत हो चुकी है जबकि प्रो समेत कुछ कर्मचारी रिटायर हो गए हैं।
गौरतलब है कि महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ की स्थापना महात्मा गांधी के मूल्यों को स्थापित करने के लिए की गई थी। लेकिन उस संस्थान में ऐसे विभागाध्यक्ष और निदेशक अभी भी कार्यरत हैं जिनके ऊपर जांच समितियों ने एफआईआर दर्ज कराने की संस्तुति की है।